Thursday, 12 May 2016

ek prem kavita

पानी बहता  है - 
तुम्हारे प्रेम की तरह ;
 उसकी  देह  को छूता
 उसके  केशों से झरता
बूँद बूँद ,चूमता है
उसकी  ग्रीवा को ,
उसके  सुकोमल  कंधो   से  फिसलकर
शिखरों  पे चढ़ जाता है ज्वार सा -
भाटे  सा अपने उतार  में
नाभि पे जा टिकता है !
पानी उसकी देह पे
तुम्हारे  प्रेम की कविता लिखता है
उसकी देह कोरा कागज़ ;बन जाती है
तुम्हारी नज़रें शब्दों सी छपती है
उसकी देह भरने लगती है !!
झरता पानी उसके पैरों को सहलाता है
उसका देह भीगना ;
पानी पानी का केलि करना
उसके अंगों सा रंग जाना
उसका  सकुचाना /लजाना
तुम नज़रों से प्रेम के नये छंद गढ़ते  हो
तुम उसकी देह पर कविता  लिखते हो !