अभिसार ,
वो करता है अभिसार -
फूलों ,वनस्पतियों ,और हरी दूब से
वो बिखेर देता है प्रकृति के सबरंग मुझ पर
;मेरी देह के रंगो को मिलाकर ;
कुछ चित्र बनाता है /
प्रेम के ,सौंदर्य के ,अभिसार के !
वो अनायास ही चित्रकार बन जाता है
उगते सूर्य की मेरे माथे पे बिंदी लगाकर
शेष लालिमा मेरे अधरों पे सजाकर
वो मेरे लावण्य को उभार, थामता है मेरा चेहरा
अपने कोमल हाथों से ;
टोहता है निरन्तर
मेरी भंगिमाओं में मिश्रित प्रेम को
धीरे से चुरा लेता है ;
अपने अधरों की छुअन से -
वो मेरा अभिसार करता है !!