Saturday, 30 April 2016


अभिसार ,

 

 वो  करता  है अभिसार - 
फूलों ,वनस्पतियों ,और हरी दूब से
वो बिखेर देता है प्रकृति के सबरंग मुझ पर
;मेरी देह के रंगो को मिलाकर ;
कुछ चित्र बनाता  है /
प्रेम के ,सौंदर्य के ,अभिसार के !
वो अनायास ही चित्रकार बन जाता है
उगते सूर्य की मेरे माथे पे बिंदी लगाकर
शेष लालिमा मेरे अधरों पे सजाकर
वो मेरे लावण्य को उभार, थामता है मेरा चेहरा
अपने कोमल हाथों से  ;
टोहता है निरन्तर 
 मेरी भंगिमाओं में मिश्रित प्रेम को
धीरे से चुरा लेता है  ;
अपने अधरों की छुअन से -
 वो मेरा अभिसार करता है !!

Thursday, 28 April 2016

  Pranay..

वो मुझसे नहीं कहता ,
प्रेम के रूपक...
लुभावनी/ मोहक बाते..
उसकी आँखों से झरते है शब्द;
दहकते गुलमोहर से..
मेरी देह की गुनगुनी धुप मे !
उसकी अनछुई.. छुअन..
प्रणय निवेदन करते नेत्र ,
देखने भर से कर देते है रूपाभ..
बना देते है मुझे उज्ज्वल नक्षत्रों सा ..
या पानी मे दिखते चन्द्रबिम्ब सा !!
वो देखता है मुझे; सध्यस्नाता
बहते पानी का स्पर्श..मेरी देहभीगना
मेरा लज्जा से झुकना ..
उसका लावण्य को निहारना..
आत्मा से आत्मा का प्रणय..
आत्मा देह का अंनत स्वप्न बुनती है !!! 
                       

Monday, 25 April 2016

ZAMEEN

एक बीज रोपा था.....
मैंने प्रेम की जमीन पर !
तुमने नेह से सींचा...
मैंने मोह की धुप दे...
तुमने हथेलियों में सहेजा ;
मेरी प्रीत के अंकुर फूटे....
तुम्हारी चाहत की कोपले भी !!
फिर उन अद्भुत  क्षणों  में कलियाँ  खिली.....
और  जादुई फूलों में बदल गई  /
तुम्हारी  मुस्कान  के फूल झरने लगे ...
हमारे  प्रेम की ज़मीन  और महकने लगी !!!
 

kaun ho tum

तेज धुप में ,
गुलमोहर की छाँव से तुम....
तेज़  बारिशों  मे ,
घने  कचनार  से  तुम....
कोहरे  से भरी  सर्द  सुबहो  में ,
अलाव में शेष  आग से  तुम ..
तुम  कौन  हो मेरे ?
पूछती हु स्वयं  से ...
मेरे प्रत्याशित जीवन में,
अप्रत्याशित से तुम....
अनंत  संभावनाओं  से परिपूर्ण.....
मेरे प्रेम का अंतिम  पड़ाव हो तुम.......