Monday, 20 June 2016

barish

ये स्याह बदलियां ;
तुम्हे मेरे बालों सी लगती है..काली / घनेरी
बारिश की बूंदे -
मानों मेरे गीले बालों से झरता पानी
 तुम्हारे चेहरे को चूमता  ;
हर बूँद एक चुम्बन  सी
भीगी -भीगी ,महकी सी !
तुम बूँदों को गिरने नहीं देते
अपनी खुली हथेलियों से थाम लेते हो
मेरी छुअन का अहसास -
इन बूँदों में खोजते हो  ..
 में होती हूँ इनमे  .. हमेशा ...
बरसती हुई ;आती हूँ
तुम्हारे पास ...
इन बारिशों में ,साथ भीगने !!

Friday, 17 June 2016

yowan

उसका यौवन -
हवा में  झूमते अमलतास के फूलों के गुच्छे सा
खिला -खिला /भरा -भरा  !
तुमने छुआ तो ;
वह फूल -फूल सी बिखर गयी...
तुम्हारे गालों पे /होंठो पे...
गर्दन पे और सीने पे !!
उसकी गंध से तुम महकने लगे
वह बिखरती रही....
तुम  समेटते  रहे
रूप /गंध /प्रेम /स्पर्श
सिर्फ शब्द न रहे ;
जीवंत हो गए..
उस क्षण में ,जब वह लावण्या
तुम पर झरती रही /
लजाती रही /सिमटती रही
तुम्हारे भीतर; समाहित
अंतहीन गहराईयों में !!!



 

keli


उस  क्षण मे ,
सब थम जाता है -
जब दो देह एकाकार होती है
श्वास के स्वर गूंजते है ;
एक अद्भुत मौन के सिरे पर
कुछ भी मध्य नहीं रहता ...
उसका मन भी नहीं /उसका अहम भी नहीं
वह लज्जा से उस पर झुकती है ..
वह दिगम्बरा धरा सी..
अपने श्यामल केशों की बदली से उसे ढांपती
अपने दोनों वृत्तों  में
उसे छुपा लेती है -
किसी से भी न बाँटने के लिए ;
वह उसे अंगीकार करती है -
अपने  भीतर समाहित करती है /
वह स्वीकार करती है उसे
वह स्वीकार करती है उसके प्रेम को !
 

Thursday, 12 May 2016

ek prem kavita

पानी बहता  है - 
तुम्हारे प्रेम की तरह ;
 उसकी  देह  को छूता
 उसके  केशों से झरता
बूँद बूँद ,चूमता है
उसकी  ग्रीवा को ,
उसके  सुकोमल  कंधो   से  फिसलकर
शिखरों  पे चढ़ जाता है ज्वार सा -
भाटे  सा अपने उतार  में
नाभि पे जा टिकता है !
पानी उसकी देह पे
तुम्हारे  प्रेम की कविता लिखता है
उसकी देह कोरा कागज़ ;बन जाती है
तुम्हारी नज़रें शब्दों सी छपती है
उसकी देह भरने लगती है !!
झरता पानी उसके पैरों को सहलाता है
उसका देह भीगना ;
पानी पानी का केलि करना
उसके अंगों सा रंग जाना
उसका  सकुचाना /लजाना
तुम नज़रों से प्रेम के नये छंद गढ़ते  हो
तुम उसकी देह पर कविता  लिखते हो !

Saturday, 30 April 2016


अभिसार ,

 

 वो  करता  है अभिसार - 
फूलों ,वनस्पतियों ,और हरी दूब से
वो बिखेर देता है प्रकृति के सबरंग मुझ पर
;मेरी देह के रंगो को मिलाकर ;
कुछ चित्र बनाता  है /
प्रेम के ,सौंदर्य के ,अभिसार के !
वो अनायास ही चित्रकार बन जाता है
उगते सूर्य की मेरे माथे पे बिंदी लगाकर
शेष लालिमा मेरे अधरों पे सजाकर
वो मेरे लावण्य को उभार, थामता है मेरा चेहरा
अपने कोमल हाथों से  ;
टोहता है निरन्तर 
 मेरी भंगिमाओं में मिश्रित प्रेम को
धीरे से चुरा लेता है  ;
अपने अधरों की छुअन से -
 वो मेरा अभिसार करता है !!

Thursday, 28 April 2016

  Pranay..

वो मुझसे नहीं कहता ,
प्रेम के रूपक...
लुभावनी/ मोहक बाते..
उसकी आँखों से झरते है शब्द;
दहकते गुलमोहर से..
मेरी देह की गुनगुनी धुप मे !
उसकी अनछुई.. छुअन..
प्रणय निवेदन करते नेत्र ,
देखने भर से कर देते है रूपाभ..
बना देते है मुझे उज्ज्वल नक्षत्रों सा ..
या पानी मे दिखते चन्द्रबिम्ब सा !!
वो देखता है मुझे; सध्यस्नाता
बहते पानी का स्पर्श..मेरी देहभीगना
मेरा लज्जा से झुकना ..
उसका लावण्य को निहारना..
आत्मा से आत्मा का प्रणय..
आत्मा देह का अंनत स्वप्न बुनती है !!! 
                       

Monday, 25 April 2016

ZAMEEN

एक बीज रोपा था.....
मैंने प्रेम की जमीन पर !
तुमने नेह से सींचा...
मैंने मोह की धुप दे...
तुमने हथेलियों में सहेजा ;
मेरी प्रीत के अंकुर फूटे....
तुम्हारी चाहत की कोपले भी !!
फिर उन अद्भुत  क्षणों  में कलियाँ  खिली.....
और  जादुई फूलों में बदल गई  /
तुम्हारी  मुस्कान  के फूल झरने लगे ...
हमारे  प्रेम की ज़मीन  और महकने लगी !!!
 

kaun ho tum

तेज धुप में ,
गुलमोहर की छाँव से तुम....
तेज़  बारिशों  मे ,
घने  कचनार  से  तुम....
कोहरे  से भरी  सर्द  सुबहो  में ,
अलाव में शेष  आग से  तुम ..
तुम  कौन  हो मेरे ?
पूछती हु स्वयं  से ...
मेरे प्रत्याशित जीवन में,
अप्रत्याशित से तुम....
अनंत  संभावनाओं  से परिपूर्ण.....
मेरे प्रेम का अंतिम  पड़ाव हो तुम.......