तेज धुप में ,
गुलमोहर की छाँव से तुम....
तेज़ बारिशों मे ,
घने कचनार से तुम....
कोहरे से भरी सर्द सुबहो में ,
अलाव में शेष आग से तुम ..
तुम कौन हो मेरे ?
पूछती हु स्वयं से ...
मेरे प्रत्याशित जीवन में,
अप्रत्याशित से तुम....
अनंत संभावनाओं से परिपूर्ण.....
मेरे प्रेम का अंतिम पड़ाव हो तुम.......
गुलमोहर की छाँव से तुम....
तेज़ बारिशों मे ,
घने कचनार से तुम....
कोहरे से भरी सर्द सुबहो में ,
अलाव में शेष आग से तुम ..
तुम कौन हो मेरे ?
पूछती हु स्वयं से ...
मेरे प्रत्याशित जीवन में,
अप्रत्याशित से तुम....
अनंत संभावनाओं से परिपूर्ण.....
मेरे प्रेम का अंतिम पड़ाव हो तुम.......
बहुत बढ़िया वकील साहिबा
ReplyDeleteलिखते रहिए।
गुलमोहर से ज्यादा लगाव है आपको... :))
ReplyDeleteBahut hi acha hai mam
ReplyDeleteBahut hi acha hai mam
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