ek prem kavita
पानी बहता है -तुम्हारे प्रेम की तरह ;
उसकी देह को छूता
उसके केशों से झरता
बूँद बूँद ,चूमता है
उसकी ग्रीवा को ,
उसके सुकोमल कंधो से फिसलकर
शिखरों पे चढ़ जाता है ज्वार सा -
भाटे सा अपने उतार में
नाभि पे जा टिकता है !
पानी उसकी देह पे
तुम्हारे प्रेम की कविता लिखता है
उसकी देह कोरा कागज़ ;बन जाती है
तुम्हारी नज़रें शब्दों सी छपती है
उसकी देह भरने लगती है !!
झरता पानी उसके पैरों को सहलाता है
उसका देह भीगना ;
पानी पानी का केलि करना
उसके अंगों सा रंग जाना
उसका सकुचाना /लजाना
तुम नज़रों से प्रेम के नये छंद गढ़ते हो
तुम उसकी देह पर कविता लिखते हो !
beautifully written :)
ReplyDeleteखूबसूरत 💐
ReplyDelete"तुम नज़रों से प्रेम के नये छंद गढ़ते हो
ReplyDeleteतुम उसकी देह पर कविता लिखते हो !"
ये पंक्तियाँ इतनी सुन्दर हैं कि स्वर्णाक्षरों में अंकित होनी चाहिए|