Friday, 17 June 2016

keli


उस  क्षण मे ,
सब थम जाता है -
जब दो देह एकाकार होती है
श्वास के स्वर गूंजते है ;
एक अद्भुत मौन के सिरे पर
कुछ भी मध्य नहीं रहता ...
उसका मन भी नहीं /उसका अहम भी नहीं
वह लज्जा से उस पर झुकती है ..
वह दिगम्बरा धरा सी..
अपने श्यामल केशों की बदली से उसे ढांपती
अपने दोनों वृत्तों  में
उसे छुपा लेती है -
किसी से भी न बाँटने के लिए ;
वह उसे अंगीकार करती है -
अपने  भीतर समाहित करती है /
वह स्वीकार करती है उसे
वह स्वीकार करती है उसके प्रेम को !
 

2 comments:

  1. वाह! सम्मिलन का ऐसा सजीव चित्रण | इसमें रोमांच भी है, उर्जा भी और चरम आनंद गर्भित गहनता भी|

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  2. वाह बेहद खूबसूरत।।

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