Pranay..
वो मुझसे नहीं कहता ,
प्रेम के रूपक...
लुभावनी/ मोहक बाते..
उसकी आँखों से झरते है शब्द;
दहकते गुलमोहर से..
मेरी देह की गुनगुनी धुप मे !
उसकी अनछुई.. छुअन..
प्रणय निवेदन करते नेत्र ,
देखने भर से कर देते है रूपाभ..
बना देते है मुझे उज्ज्वल नक्षत्रों सा ..
या पानी मे दिखते चन्द्रबिम्ब सा !!
वो देखता है मुझे; सध्यस्नाता
बहते पानी का स्पर्श..मेरी देहभीगना
मेरा लज्जा से झुकना ..
उसका लावण्य को निहारना..
आत्मा से आत्मा का प्रणय..
आत्मा देह का अंनत स्वप्न बुनती है !!!
प्रेम के रूपक...
लुभावनी/ मोहक बाते..
उसकी आँखों से झरते है शब्द;
दहकते गुलमोहर से..
मेरी देह की गुनगुनी धुप मे !
उसकी अनछुई.. छुअन..
प्रणय निवेदन करते नेत्र ,
देखने भर से कर देते है रूपाभ..
बना देते है मुझे उज्ज्वल नक्षत्रों सा ..
या पानी मे दिखते चन्द्रबिम्ब सा !!
वो देखता है मुझे; सध्यस्नाता
बहते पानी का स्पर्श..मेरी देहभीगना
मेरा लज्जा से झुकना ..
उसका लावण्य को निहारना..
आत्मा से आत्मा का प्रणय..
आत्मा देह का अंनत स्वप्न बुनती है !!!
खूबसूरत
ReplyDeleteवाह
प्रेम और मौन का समीकरण बड़ा सलोना है। हर बार इस मौन प्रेम के संयोग से फूटती है ऐसी ही सलोनी कविता। विशिष्ट।
ReplyDeleteसध्यस्नाता नहीं सद्यःस्नात लिखिए। इस कविता में यह टाइपिंग त्रुटि कष्ट देती है।
एक शब्द ........खूबसूरत
ReplyDeleteएक शब्द ........खूबसूरत
ReplyDeleteहिंदी.... !!!!
ReplyDeleteमाशाअल्लाह :))
thanks to all who reads me n encouraged me
ReplyDeleteवाह!खूब लिखा
ReplyDeleteतत्सम सुन्दर शब्दावली
ReplyDeleteतत्सम सुन्दर शब्दावली
ReplyDeleteस्वर्णिम !
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