एक बीज रोपा था.....
मैंने प्रेम की जमीन पर !
तुमने नेह से सींचा...
मैंने मोह की धुप दे...
तुमने हथेलियों में सहेजा ;
मेरी प्रीत के अंकुर फूटे....
तुम्हारी चाहत की कोपले भी !!
फिर उन अद्भुत क्षणों में कलियाँ खिली.....
और जादुई फूलों में बदल गई /
तुम्हारी मुस्कान के फूल झरने लगे ...
हमारे प्रेम की ज़मीन और महकने लगी !!!
मैंने प्रेम की जमीन पर !
तुमने नेह से सींचा...
मैंने मोह की धुप दे...
तुमने हथेलियों में सहेजा ;
मेरी प्रीत के अंकुर फूटे....
तुम्हारी चाहत की कोपले भी !!
फिर उन अद्भुत क्षणों में कलियाँ खिली.....
और जादुई फूलों में बदल गई /
तुम्हारी मुस्कान के फूल झरने लगे ...
हमारे प्रेम की ज़मीन और महकने लगी !!!
ये ज़मीन सदैव महकती रहे
ReplyDeleteशुभकामनाएं...... लिखते रहिए।
खुबसूरत :))
ReplyDeletethanks
ReplyDeleteखूबसूरत
ReplyDeleteबहुत मनमोहक
ReplyDeleteतुम्हारी मुस्कान के फूल झरने लगे ...
ReplyDeleteहमारे प्रेम की ज़मीन और महकने लगी ...👏👏👏
तुम्हारी मुस्कान के फूल झरने लगे ...
ReplyDeleteहमारे प्रेम की ज़मीन और महकने लगी ...👏👏👏
आपकी कलम मे जबरदस्त ताक़त है ! 👌👌👌
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