Monday, 25 April 2016

ZAMEEN

एक बीज रोपा था.....
मैंने प्रेम की जमीन पर !
तुमने नेह से सींचा...
मैंने मोह की धुप दे...
तुमने हथेलियों में सहेजा ;
मेरी प्रीत के अंकुर फूटे....
तुम्हारी चाहत की कोपले भी !!
फिर उन अद्भुत  क्षणों  में कलियाँ  खिली.....
और  जादुई फूलों में बदल गई  /
तुम्हारी  मुस्कान  के फूल झरने लगे ...
हमारे  प्रेम की ज़मीन  और महकने लगी !!!
 

8 comments:

  1. ये ज़मीन सदैव महकती रहे
    शुभकामनाएं...... लिखते रहिए।

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  2. बहुत मनमोहक

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  3. तुम्हारी मुस्कान के फूल झरने लगे ...
    हमारे प्रेम की ज़मीन और महकने लगी ...👏👏👏

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  4. तुम्हारी मुस्कान के फूल झरने लगे ...
    हमारे प्रेम की ज़मीन और महकने लगी ...👏👏👏

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  5. आपकी कलम मे जबरदस्त ताक़त है ! 👌👌👌

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